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बोलो कॉमरेड क्या करोगे

30 October, 2014

भारत के वामपंथी एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़े हैं और लगता है कि उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है। कम्युनिस्ट पार्टियों की आज जो हालत हो गई है, एक दशक पहले 2004 में कल्पना तक नहीं की जा सकती थी। उस दौर में कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं ने माकपा महासचिव प्रकाश करात को …और पढ़ें

द्वारा:सुदीप ठाकुर

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एक कदम चलो अक्ल की ओर

30 October, 2014

सब ओर साफ सफाई है। हर शहर, कस्बा और गांव चमचमा रहा है। मंत्री, नेता, अफसर। सब झाड़ू लेकर लगे हैं। स्वच्छ भारत अभ‌ियान के लिए नरेंद्र मोदी की ज‌ितनी भी तारीफ की जाए वह कम है। अगर मैं ऐसे ल‌िखूं तो हो सकता है कि मुझे साधुवाद की ढेरों टिप्पण‌ियां मिल जाएं। मगर लेखक …और पढ़ें

द्वारा:सुधीर राघव
टॉपिक:समाज

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दिल्ली का शहीद बनाम जंगल का शहीद

20 October, 2014

देश की राजधानी दिल्ली में कुछ गुंडों ने एक पुलिस के सिपाही को गोली मार दी. उस समय वह सिपाही गश्त पर था और गुंडों को थाने ले जा रहा था. कुछ राजनीतिक बयानबाज़ियों के बाद दिल्ली की सरकार की ओर से उसके परिजनों को एक करोड़ रुपए देने की घोषणा की गई है. मानना …और पढ़ें

द्वारा:विनोद वर्मा
टॉपिक:राजनीति

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अमर उजाला ब्लॉग

army

फिर कैसे मिलेंगे उत्तराखंड से सैनिक

31 October, 20142 प्रतिक्रियाएँ »

जिस सैन्य परंपरा पर उत्तराखंड गर्व करता आया है। जिस गबर सिंह और दरबान सिंह और चंद्र सिंह गढवाली की शौर्य गाथाओं को सुनकर पहाड़ों से युवा सेना में भर्ती होते रहे हैं, उस उत्तराखंड के लिए इस परंपरा को लेकर मायूस करने वाली बातें भी सामने आ रही है। ऐसा नहीं कि  उत्तराखंड के …और पढ़ें

द्वारा:वेद विलास

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प्रेमिका ने लिख भेजीं अंतरंग बातें

22 October, 201438 प्रतिक्रियाएँ »

“काश! वो ट्रेन गाजियाबाद रुकती और वो मिल जाती” से आगे… कल मैं दिल्ली से वापस लौट आई। कहने को अकेले आई हूं, सबने देखा भी, लेकिन जो कोई नहीं देख पाया वो सारी बातें इधर-उधर बिखरी पड़ी हैं। कितना भी कोशिश करूं, समेट नहीं सकती। समझ नहीं आ रहा कि शुरू कहां से करूं। …और पढ़ें

टॉपिक:कला

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जादू चलता नहीं चलाया जाता है…

21 October, 2014कोई प्रतिक्रिया नहीं »

हिंदी में एक शब्द है जादू। बोलचाल में अक्सर प्रयोग किया जाता है कि फलां का जादू चल गया। फलां का जादू बरकरार है। फला का जादू नहीं चला। जब व्यक्ति के समझ में नहीं आने वाली घटनाएं हो जाती हैं तो उसे जादू कह दिया जाता है। इस एक शब्द में बहुत सारी कमियों …और पढ़ें

टॉपिक:राजनीति

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army

फिर कैसे मिलेंगे उत्तराखंड से सैनिक

31 October, 20142 प्रतिक्रियाएँ »

जिस सैन्य परंपरा पर उत्तराखंड गर्व करता आया है। जिस गबर सिंह और दरबान सिंह और चंद्र सिंह गढवाली की शौर्य गाथाओं को सुनकर पहाड़ों से युवा सेना में भर्ती होते रहे हैं, उस उत्तराखंड के लिए इस परंपरा को लेकर मायूस करने वाली बातें भी सामने आ रही है। ऐसा नहीं कि  उत्तराखंड के …और पढ़ें

द्वारा:वेद विलास

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सुनहरे अक्षरों में दर्ज रहेगा यह ‘ इत्तेफाक ‘

31 October, 2014कोई प्रतिक्रिया नहीं »

लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म और शक्ति रूपा इंदिरा गांधी का शहादत दिवस एक ही होना महज इत्तेफाक हो सकता है। किंतु, घटनाओं के इतिहास क्रम पर गौर करें, तो लगता है कि पिछली शताब्दी मे भारतीय राजनीति के कई नायकों मे से ये दोनों नियति के निर्धारित एक ही उद्देश्य और …और पढ़ें

द्वारा:S.Aryaji

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jhadu1

चल निकाल हाथ की मैल

30 October, 2014कोई प्रतिक्रिया नहीं »

जब मैंने सुना कि प्रधानमंत्री के स्वच्छ भारत अभियान की धमक हमारे मोहल्ले तक पहुंच चुकी है, तो मेरी छाती छप्पन इंच की हो गई। लेकिन मैं ‘सबसे भले विमूढ जिन्हें न व्यापे जगत गति’ की तरह घर से नहीं निकला, तो नहीं निकला। हालांकि घरैतिन ने कई बार ताने मारे, लोगों की सक्रियता का …और पढ़ें

द्वारा:ashok mishra
टॉपिक:साहित्य

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sc

सुप्रीम कोर्ट और काला धन

30 October, 20141 प्रतिक्रिया »

काले धन पर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई में जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को दो दिन पहले फटकार लगायी थी उसके बाद यह लगने लगा था कि इस मामला का हश्र भी कोयला आवंटन जैसा होने वाला है जिसमें सरकार की कोशिशों के बाद भी कुछ ब्लॉक्स छोड़कर सभी के आवंटन …और पढ़ें

द्वारा:drashu
टॉपिक:राजनीति

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ग़ज़ल

30 October, 2014कोई प्रतिक्रिया नहीं »

इक नए बोझ के पहले से ही दुखने क्यों हैं। सारे अरमान जो घुटने हैं तो घुटने क्यों हैं। पीठ देते हैं जो हर बार गिरे पर मेरे ऐसे अपने ही कहे जाएं, तो अपने क्यों हैं। ख़्वाब अच्छे तो लगें नींद में रहने वाले साथ उठकर जो पसर जाएं वे सपने क्यों हैं। बीत …और पढ़ें

द्वारा:suneelsamvedi
टॉपिक:साहित्य

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